अवचेतन मन की चेतना
मन के अवचेतन में कुछ चेतन सा चलता रहता है एक आग लगी हो सीने में और मन धधकता रहता है सोचों से परे कोई चिंगारी भड़कती रहती है खुद के वजूद की तलाश में एक आग सुलगती रहती है टूट टूट कर बिखर गयी और हर कणकण में समा गया फिर भी कोई मुझ पर बेगैरत की तोहमत लगा गया...
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sangeeta swarup
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[05 Mar 2010 08:57 AM]



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