अपने

रचना रवीन्द्र अपनेअपनों में ही अपनों को ढूंढा करती थी, मैं अपनों की पदचापों को पहचाना करती, मैं अपनों की दस्तक से पहले उनका नाम बताती, मैं अपनों की ही छाया से आच्छादित होती, मैं फिर भी अपनों में ही अपनों को ढूंढा करती थी, मैं अपनों की हर बात से आशान्वित होती, मैं... [पूरी पोस्ट]
writer रचना दीक्षित

कविता

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[21 Feb 2010 01:03 AM]

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