खाना हो आम तो बोएं बबूल

मनोज खाना हो आम तो बोएं बबूल -- परशुराम राय आम के फलों सेये लद गए बबूल अबभ्रम में पड़ी कोयलेंनिहारती आवास निजकंटीले आम्रकुंज ।सोचती-“आम में ये काँटे बबूल के ?या ईमान ही बदला धरा काया बदला है स्‍वादजल का ही जलद से कुछ?या बदला है तेवर हीसूरज की दृष्टि का?या... [पूरी पोस्ट]
writer करण समस्तीपुरी

काव्य-प्रसून

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[23 Feb 2010 08:00 AM]

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