चैत खेलब बलजोरी हो रामा....
-- करण समस्तीपुरी फागुन का रंग उतरा भी नहीं कि चतुरंगिनी चैती बयार चित्त की चंचलता में चार-चार चपल-चारु पंख लगा रही है। ऋतुराज के यौवन पर मन्मथ की मार से उपजे जलन को फागुन का पूर्ण-चन्द्र भी शीतल न कर सका। वसुधा की धानी चुनर के रंग ढलने लगे, प्रकृति का...
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करण समस्तीपुरी
फुर्सत में ...
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[06 Mar 2010 09:07 AM]



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