वहीं जहाँ से आई थी

स्पंदन     ( SPANDAN) नारीबंद खिड़की के पीछे खड़ी वो,सोच रही थी कि खोले पाट खिड़की के,आने दे ताज़े हवा के झोंके को,छूने दे अपना तन सुनहरी धूप को.उसे भी हक़ है इसआसमान की ऊँचाइयों को नापने का,खुली राहों में अपने ,अस्तित्व की राह तलाशने का,वो भी कर सकती हैअपने, माँ -बाप के... [पूरी पोस्ट]
writer shikha varshney
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[08 Mar 2010 05:32 AM]

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