भंग का रंग........जोगी जी.... जरा....बच के.....!!!

शिल्पकार के मुख से होली का माहौल बन रहा है. रंग-अबीर-गुलाल और गारी-ठिठोली भी चलेगी जम कर भंग भी घुटेगी और ठंडाई के साथ छनेगी-चढ़ेगी. ऐसे हालत में कभी कभी लोग अपने घर का ही रास्ता भूल जाते हैं या बुरा ना मानो होली है कह के थोड़ी "मौज लेने" के चक्कर में रहते हैं. अगर कहीं फँस... [पूरी पोस्ट]
writer ललित शर्मा

ललित शर्मा

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[10 Feb 2010 19:30 PM]

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