काहे को सताय,बाली उमर लरकैया--होली की तरंग (ललित शर्मा)
बस अब फ़ाग-राग और होली का धमाल-व्यंग्य के तीर और स्नेह का गुलाल, ब्लाग जगत मे भी उड़ना शुरु हो गया है। होली का रंग दिखने लगा हैं भंग के साथ---यही होली की रीत है--यही मानुस की प्रीत है----होली के फ़ाग गीतों मे अपुर्व श्रृंगार भरा है। प्रेम उमड़ने लगता...
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ललित शर्मा
शिल्पकार
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[23 Feb 2010 00:44 AM]



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