त्याग दो ऐसा त्रिभूज

भारतीय वास्तु शास्त्र त्याग दो ऐसा त्रिभूज त्रिभुज जहाँ कहीं बने , समझ उसे त्रिशूल । दिन-दिन भारी कष्ट दे , कभी न कर तू भूल ।। कभी न कर तू भूल, हो मुकदमा बिना बात। धन का होवे धूल, धूल उड़ेगी दिन-रात।। कह ‘वाणी’ कविराज, जेल जाय अग्रज-अनुज। बिताय चैदह साल, त्याग दे ऐसा त्रिभुज।।... [पूरी पोस्ट]
writer amritwani.com

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[15 Feb 2010 10:11 AM]

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