तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहट

Shreesh UVACH तितर-बितर मन : एक बड़बड़ाहटतितर-बितर मनभीतर कुनमुना रहा एक आलापजो अनगढ़ सपनों से बन पड़ा है.गला सूख रहा; सारे आदर्श वाक्य निस्तेज से हैं.सब समझ लेता है मन, उधेड़बुन पर जाती नहीं.दरक रहे केंचुल संस्कारों के, रेंग रही देह शाश्वत पहनावे में से.ताना-बाना... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीश पाठक 'प्रखर'

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[03 Mar 2010 23:04 PM]

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