ऐ हुस्न - तेरा हर गुरूर सर आँखों पे
कहते हैं हुस्न का गुरूर करना जायज़ है,पर ज़रा इश्क के दिल से भी कोई पूछ ले कभी,कैसा लगता है चाँद कोजब चांदनी को खुद से अलग करना पड़ता है।माना की हुस्न की ताजगी में यह सारी कायनातधुली हुई सी लगती है,पर इश्क के जल जाने में भीएक अजीब कशिश सी है।जंगलों,...
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पियूष अग्रवाल
कविता
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[14 Feb 2010 07:08 AM]



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