उद्विग्न-व्याकुलता
मेघ पुनः संदेशा लाए,मग में कोई नयन बिछाए |कैसे आऊँ द्वार तुम्हारे ,तेरे-मेरे नेह के पथ में घिर आते हैं जग के साए |निशा गयी और प्रात हुआ अब,स्वप्न-आकृति छूटी मन की |एक-दूसरे से मिल न सके , यह विडम्बना है जीवन की ||धूसर दिवस आज प्रिय तुम बिन, विप्लव की...
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धीर.
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[11 Feb 2010 12:46 PM]



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