गोरख जागा, मुंछदर जागा और मुंछदर भागा
यह किस्सा गोरख जागा, मुंछदर जागा और मुंछदर भागा तक पहुँचाया, और धीरे धीरे ऎसे अड़चन आन पड़ी और ऎसी बान बनी कि हिरदय में एक छिन को लगता रानी केतकी की पूरी कहानी मेरे पन्नों पर कभी उतर कर न आ पावेगी । जिस घडी इसे पूरी करने की...
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डा. अमर कुमार
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[21 Feb 2010 16:49 PM]



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