मैं और मेरी तनहाई

खुद पर है यकीं छू लेंगे आसमां जब दिल की बात जुबां पर नहीं आए...बार-बार समझाने के बावजूद गले तक आकर अटक जाए...दिल में हल्की सी आहट हो...दिलों-दिमाग काम करना बंद कर दें...मन हल्का और सिर भारी हो जाए...हालात ऐसे कि ना दुआ लगे और ना ही दवा...रगों में दौड़ रहे खून की दौड़ मानो थम सी... [पूरी पोस्ट]
writer विश्वनाथ सैनी
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[27 Feb 2010 07:01 AM]

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