ज़िंदगी!!!

चिंतन मेरे मन का मस्तिष्क के प्रांगण मेंप्रतिद्वन्दता कराती जिन्दगीउठाती - गिराती ज़िन्दगीजलाती - बुझाती जिन्दगीबनाती - बिगाड़ती जिन्दगीरुठती - मनाती जिन्दगीरुलाती लेकिन हंसाती जिन्दगीइठलाती लेकिन खेलती जिन्दगीचुपचाप लेकिन बोलती जिन्दगीपूछती लेकिन उतर देती जिन्दगीइन्कार... [पूरी पोस्ट]
writer प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
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[15 Feb 2010 09:41 AM]

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