रंगोली
अनमना सा मैं। डूबा तो अपने शहर के उन दिनों तक जा पहुंचा जो दिलोदिमाग में जड से गये हैं, पिघला तो पिघलता ही चला गया। होता है कभी कभी ऐसा भी। फिर शब्दों ने नहीं देखा कि उसकी बनावट कैसी है, वो किस रूप में हैं। जब यथार्थ के धरातल पर आकर शब्दों की ओर नज़र गईं...
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अमिताभ श्रीवास्तव
यादें
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[18 Feb 2010 15:10 PM]



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