आंखों में कल का सपना है
ओफिस से रात में लौटना होता है, अमूमन आधी रात चढ जाया करती है। जब गांव वाले अपनी नींद को बिदाई देने के लिये अंतिम खर्राटे लिया करते हैं तब मैं अपने घर पहुंच कर या तो दरवाजा खटखटाता हूं या फिर बेल बजाता हूं। अज़ीब सी जिन्दगी है महानगरों की। खैर..लौटा ही था...
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अमिताभ श्रीवास्तव
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[23 Feb 2010 14:31 PM]



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