खेलूं मैं होरी
कृष्ण होली खेलने के लिए गलियों में निकलते हैं उन्हें देखते ही सारी गोपियाँ छुप जाती हैं लेकिन तभी एक कमसिन गोपी उनके हाँथ आ जाती है और वो उसी से होली खेलने लगते हैं. तो वह गोपी क्या कहती है… बारी उमरिया है मोरी
ओ कान्हा मोसें खेलो न होली रंग नहीं...
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satyanshu
kavitageetholiखेलूं मैं होरी
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[01 Mar 2010 07:17 AM]



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