...कैसे???
टुकडों में जी जाती है जिंदगी कैसे?ज़ख्मों की की जाती है गिनती कैसे?मेरा हर झूठ बन जाता है सच,इस सच पे लिखूं शायरी कैसे?हर तरफ़ अपनों की लगी है भीड़,इस शोर को कहूँ तन्हाई कैसे?अन्दर कुछ,बाहर कुछ और हूँ मैं,आईने में देखूं अपनी सच्चाई कैसे?कहते हैं फकीरी...
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knkayastha
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[24 Feb 2010 09:11 AM]



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