दुश्मन
मिलते हैं यहाँ दुश्मन, हमसाज़ नहीं मिलतेजो दोस्त हैं उनके भी अंदाज़ नहीं मिलतेये ज़ुल्मो-सितम कैसे मिट पाएँगे दुनिया सेबुजदिल हैं सभी चेहरे जांबाज़ नहीं मिलतेजख्मी है बदन अपना ये रूह भी जख्मी हैहाल अपना बताने को अल्फाज़ नहीं मिलतेकोई भी किसी से अब कुछ भी...
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अर्चना तिवारी
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[15 Feb 2010 07:00 AM]



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