कौटिल्य दर्शन-कभी पर्वत की तरह सहनशील तो कभी अग्नि की तरह तीक्ष्ण बन जायें
काले सहिष्णुगिंरिवदसहिश्णुश्चय वह्वित्।।स्कन्धेनापि वहेच्छत्रन्प्रियाणि समुदाहरन्।।हिन्दी में भावार्थ-समय आने पर पर्वत के समान सहनशील और अग्नि के समान असहनशील हो जायें। समय पर मित्र के कंधे पर हाथ रखें तो शत्रु पर भी उसका प्रयोग करें।असत्यता निष्ठुरता...
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दीपक भारतदीप
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[23 Feb 2010 23:06 PM]



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