अमन की आस
Sunday, February 14, 2010अमन की आशबहुत कोशिश करता हूँ ...अपने जख्मों को भूल जाऊं ,पर वो नासूर बन कर बहता ही रहता है लाख मलहम लगता हूँ ........पर ठीक ही नहीं होने देते हैं लोग ,यह कोई और नहीं हैं ,मेरे अपने ही हैं । उसका नाम सलीम था ,उसकोअपने नाम से बड़ी...
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भंगार
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[15 Feb 2010 04:50 AM]



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