हँसी ने मित्र बनाया और हँसी ही गायब हो गयी
उसकी खनखनाती हँसी ऐसे लग रही थी जैसे झरना कलकल बह रहा हो, या सुदूर पहाड़ों के मध्य कहीं से मन्दिर की घण्टियां बज उठी हों। मैं उसकी तरफ खिचने लगी। मन कर रहा था कि यह ऐसी ही हँसती रहे और मैं उस निर्मल हँसी का पान करती रहूँ। मैंने अपनी दोस्ती का हाथ...
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Dr. Smt. ajit gupta
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[04 Mar 2010 02:29 AM]



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