...कुछ और दिखाता चेहरा
मेरे अंतर्मन को बाहर लाता चेहरा हूँ मैं कुछ और तो कुछ और दिखाता चेहरामन की मर्जी, तन बहका, कैसे काली रात में दिन में फिर मिल जाए तो क्यूँ घबराता चेहरा क्या अदा, क्या जलवा, जादू सा उसकी बातों में यादों में गुम दरपन से यूँ शरमाता चेहरा अब न तुम आते हो ना...
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प्रकाश पाखी
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[21 Feb 2010 06:23 AM]



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