कबीर के श्लोक - १०
कबीर माइआ डोलनी,पवनु वहै हिवधार॥
जिनि बिलोइआ तिनि खाइआ,अवर बिलोवनहार॥१९॥ इस श्लोक मे कबीर जी पिछले श्लोक मे कहे विचार को और अधिक स्पष्ट कर रहे हैं।वह कहते है कि माया रूपी यह जो दूध है, इसे हमारी श्वास रूपी शीतल पवन बिलोवने की तरह बिलोती जा रही है।जो लोग...
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परमजीत बाली
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[21 Feb 2010 21:18 PM]



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