विलासिता के लिए मातृत्व का सौदा

देख कबीरा औरतों को लक्षित करके किसी मशहरोमारुफशायर ने कहा है कि- मैं कभी हारी गई, पत्थर बनी, गई बनवास भी, क्या मिला द्रोपदी, अहिल्या,जानकी बनकर मुझे। इस पंक्ति को आधुनिकता के चादर में लपेट कर आज की नारी तमाम वर्जनाओं को तोडऩा चाहती और उन्मुक्त आकाश में विचरण करना... [पूरी पोस्ट]
writer सुभाष चन्द्र
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[25 Feb 2010 05:09 AM]

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