बाजार तो हद पार कर रहा

देख कबीरा आज हमारे-आपके हर क्रिया-कलाप बाजार से संबद्घ है। हम क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, क्या करते हैं - सब बाजार तय करने लगा है। महानगरों से शहर और शहर से गांव - हर जगह यही हाल है। और बाजार है कि सुरसा की भांति अपना दायरा बढ़ाता ही जा रहा है। न कोई नैतिकता, न... [पूरी पोस्ट]
writer सुभाष चन्द्र

कण्डोम

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[08 Mar 2010 01:50 AM]

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