देखा मैंने

गुलमोहर का फूल देखा उड़ते धूल को कि झूमते बबूल को छांव में जो पल रहे तृण, कर रहे अठकेलियां वह भी जले वह भी मिटे बच न सके ताप से । देखा जलते हुए तन को और घर्षण करते मन को बूँद-बूँद टपकते, और खत्म होते समय को, देखा पास आते प्रलय को । देखा सृजित होते , नष्ट होते तीव्र... [पूरी पोस्ट]
writer चंदन कुमार झा

कविता

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[18 Feb 2010 14:14 PM]

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