कुछ और सँवर गये होते

गुलमोहर का फूल   दीदी “समता” की एक रचना-     बीते दिनों को याद करते है हम, वक्त कुछ कम न था, ओह !!!  कुछ और सँवर गये होते । हँसी जो ठहाको में बदल जाती थी, मगर थी सूखी और बेवजह की, कुछ वजह होती और मुस्करा लिये होते, कुछ और सँवर गये होते । राहें... [पूरी पोस्ट]
writer चंदन कुमार झा

कविता

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[20 Feb 2010 11:02 AM]

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