पतझड़
इतने वर्षों के बाद, मिली तुम आज, इस तरह, सोचा, खेलूँगा तुम्हारे संग होली, लगा दूंगा, थोड़ा सा गुलाल, तुम्हारे गालों पर, कुछ रंग जा बसेंगे, तुम्हारी माँग में । ढ़ूंढ़ा अपनी पोटली में, पर रंग कहाँ बचे थे वहाँ । शायद पुराने बक्शे में हो, पर सबकुछ तो, साथ ले...
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चंदन कुमार झा
कविता
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[03 Mar 2010 14:29 PM]



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