तेरे काँधे पर हम हो....
गुलिस्ता बने हमहर तरफ फैली हो महक तेरी जब तेरे काँधे पर सर हो....जिन्दगी लगती हैमिश्रि की डलीजब तेरे काँधे पर सर हो....सोचती हुँ मैं बसयही गुम सुमकि तेरे काँधे पर सर हो....बन जाती हुँ सब से संपन्नसुखी सारे जहाँ मेंजब तेरे काँधे पर सर हो....ये कोई सपना...
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gargi gupta
कविता
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[04 Mar 2010 23:48 PM]



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