कब आओगे – कविता – रवि कुमार

सृजन और सरोकार कब आओगे ( a poem by ravi kumar, rawatbhata ) खुलता है ख़त और शब्द टपक पड़ते हैं कब आओगे पंछी चहचहाते हैं वृक्ष झूमते हैं गीत गाती है हवा कब आओगे मशीनों का थका देने वाला शोर लगने लगता है मधुर संगीत बोल फूट पड़ते हैं उसी ताल में कब आओगे वह सोचता है हथेलियों... [पूरी पोस्ट]
writer रवि कुमार, रावतभाटा

कविताकविताएंत्यौहारख़त

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[13 Feb 2010 08:43 AM]

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