बाबू जी सेवानिवृत्त हो गये हैं.
हाथों में सब्जी का थैला,अंतर्मन में सवालों का झमेला, उलझते, रीझते,खीझते, और कभी मुस्काते , गोलमटोल आँखों में, एक उम्मीद लिए, कभी इस कभी उस दुकान जाते, इधर-उधर,भागते,मोल भाव करते, बहू -बेटे की कमाई के चार पैसे, बचाने की जद्दोजहद में कितनी तल्लीनता से...
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विनोद कुमार पांडेय
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[18 Feb 2010 11:35 AM]



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