जाड़े के एक दिन से जुड़ा मेरा एक अनुभव-१( विनोद कुमार पांडेय)

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने दिन का तीसरा पहर,जब ठंड अपनी परिसीमा पर था,सरसराती हवा के झोंके,मंद गति से बह रहे थे,जल की ठंडी-ठंडी बूँदे,कानों में बादलों का, फरमान पढ़ रहे थे, समस्त वातावरण जब ठंड के, आगोश में ढल रहा था, जैसे रात्रि के आगमन का,पूर्वाभ्यास चल रहा था,जब सूरज की किरणें... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[02 Mar 2010 11:31 AM]

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