जाड़े के दिन से जुड़ा मेरा एक अनुभव-२(विनोद कुमार पांडेय)

मुस्कुराते पल-कुछ सच कुछ सपने कोहरे से घिरे आदमियों के,भीड़ में,मैने एक और अजीब दृश्य देखा, यूँ कहें इक्कीसवीं शताब्दी के,विकसित भारत का एक सूक्ष्म उदाहरण,भारत की भावी पीढ़ी,एवम् उसका भविष्य देखा, बदन पर मात्र एक सूती वस्त्र डाले, नंगे पैर,और आँखों में भूख लिए हुए, मूँगफली के छिलकों... [पूरी पोस्ट]
writer विनोद कुमार पांडेय
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[06 Mar 2010 08:25 AM]

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