नवगीत: रंग हुए बदरंग --संजीव 'सलिल'

KABEERA KHADA BAZAR MEIN नवगीत:संजीव 'सलिल'रंग हुए बदरंग,मनाएँ कैसे होली?...*घर-घर में राजनीतिघोलती ज़हर.मतभेदों की प्रबलहर तरफ लहर.अँधियारी सांझ है,उदास है सहर.अपने ही अपनों परढा रहे कहर.गाँव जड़-विहीनपर्ण-हीन है शहर.हर कोई नेता होतो कैसे हो टोली?...*कद से भी ज्यादा हैलंबी... [पूरी पोस्ट]
writer दिव्य नर्मदा divya narmada

samyik hindi kavita

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[06 Mar 2010 08:48 AM]

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