हमने जिस जालिम को चाहा----gazal

gazal k bahane 55दोस्त लुत्फे इन्तजार अपना यूं ही जाता रहाहाय! वो कमबख्त हरदम वक्त पर आता रहाजिसके भी हाथों में गुलदस्ते हम थमाते रहेउसके ही हाथों में पत्थर बारहा आता रहाजुल्म ढ़ाकर भी उसे था इस कदर हम पर यकींअपने हक में वो गवाही हमसे दिलवाता रहावो था मानिन्दे कसम तो... [पूरी पोस्ट]
writer श्याम सखा 'श्याम'
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[22 Feb 2010 21:38 PM]

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