मुरली तेरा मुरलीधर 46

अखिलं मधुरम् सहनशील रजकण प्रशान्त बन प्रभुपथ में बिछ जा मधुकरकिसी भाँति उसके पदतल मे ललक लिपट लटपट निर्झरप्राणकुंज के सुमन में सुन उसकी मनहर बोलीटेर रहा अर्पणानुभावा मुरली तेरा मुरलीधर ॥२४६॥हो न रही मारुत सिहरन की क्या अनुभूति तुम्हें मधुकरक्या न सुन रहे दूर तरंगित... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु । Himanshu

murali tera muralidhar

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[07 Mar 2010 07:43 AM]

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