एक व्यंग्य : हरहुआ और टी०वी०

हँसते रहो हँसाते रहो हरहुआ और टी०वी० किसी गाँव में, एक ज़मींदार साहब रहते थे।काफी लम्बी-चौड़ी ज़मींदारी थी।परन्तु जब से ज़मींदारी उन्मूलन अभियान शुरु हुआ तो उनकी ज़मींदारी ख़त्म हो गई और वह "बाबू-साहब" बन गए।ज़मींदारी तो ख़त्म हो गई परन्तु उनकी "कोठी" का "कोठापन" खत्म नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer आनन्द पाठक
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[21 Feb 2010 09:35 AM]

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