आम होने के प्रति...
मैं एक आम आदमी हूँ,बहुत ज़्यादा आम.मन जब भी होता है,ए-४ शीट में...दुनियाँ के सभी दर्द उकेरने का,तुम्हारे और मेरे आंसू...कागज़ गुलाबी बना देते हैं.मैं एक आम कवि हूँ.उस लगभग ढहती हुई दिवार से सटाकर...जब अंगीकार करता हूँ तुम्हें ,तुम्हारी पीठ से छुप जाती...
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दर्पण साह 'दर्शन'
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[19 Feb 2010 09:49 AM]



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