आग, के साथ रहते हुये

कवितायन आग,जब छटपटा रही थी पत्त्थरों में कैद तब आदमी अपने तलुओं में महसूस करता थाजलन / खुजली और मान लेता था आग को आग होने के लियेजिस दिन,आग ने दहलीज लांघी हवा से आवारापन सीखा उतर आयी आदमी की जिन्दगी में तब से आदमी नही जानता है कि क्यों उसकी बगलों में बढ़ते हैं... [पूरी पोस्ट]
writer मुकेश कुमार तिवारी
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[05 Mar 2010 05:50 AM]

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