नारी को नारी रहने दो

zakhm वो तो सीता ही थीवो तो लक्ष्मी ही थीत्याग , तपस्याप्रेम समर्पण कीबेड़ियों में जकड़ी ही थीअपने अरमानो की राखओढ़ पड़ी ही थीफिर क्यूँ तुमने मजबूर कियासीता से मेडोना बनने कोक्यूँ तुमको बाहर हीउर्वशी रम्भा दिखाई देती थींजब तुमने मजबूर कियाउसने आगे कदम बढाया... [पूरी पोस्ट]
writer वन्दना
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[06 Mar 2010 02:54 AM]

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