काश...हम होते...उंगलियां एक हाथ की!
काश! तुम होतेगर्म चाय से लबालब कपहर लम्हा निकलती तुम्हारे अरमानों की भाप...दिल होता मिठास से भराकाश!मैं होतीतुम्हारी आंख पर चढ़ा चश्मा..सोचो, वो भाप बार-बार धुंधला देती तुम्हारी नज़रकाश! मैं होती रुमाल...और तुम पोंछते उससे आंख...हौले-से ठहर जाती पलक के...
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चण्डीदत्त शुक्ल
कह रहा हूं तुमसे...
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[22 Feb 2010 08:55 AM]



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