फिर मिलेंगे !

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति लगता नही था ये क्रिसमस ईव से पहले का दिन है । ठीक उसका दिसम्बर न लगने जैसा । जब तक कोई खुद से न कहे कि यह दिसम्बर है । सड़क का एक छोर आते-आते पुल पर ख़त्म होता था । सड़क कहाँ ? शायद पगडण्डी कहना ठीक हो । जो वह पहले कही जाती रही थी । पुल के नीचे नदी सुस्त... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :

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[11 Feb 2010 07:33 AM]

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