अनुगमन !
यह महज इत्तेफाक नहींकिहम शोषित और अव्यवस्थित है ।व्यवस्थित सोच से उत्पन्न समाज मेंश्रंखलित व्यवस्था के पायदान पर खड़े होशोर भर मचानाहमारी फितरत है, बसऔर कुछ नही ।हम सोचते हैं किकोई आये, औरहम बन जायें अनुयायी ।कि शायदजो दिला सके हमेंपुनः आजादी ।मगर कौन ?उन...
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अनिल कान्त :
poetry
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[19 Feb 2010 06:29 AM]



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