उस रात फिर एक ख्वाब थपकियाँ देकर सुला दिया गया !

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति वो बैठी थी चुप, ख़ामोशी में खोयी सी । कमरे की खिड़की पर लगा अख़बार बार-बार हवा के तेज़ झोंके से फडफडाता और शांत हो जाता । बाहर चाँदनी मद्धम-मद्धम झर रही थी । खिड़की की दरारों से शीत लहर अन्दर प्रवेश कर जाती थी । तब ख़ामोशी को तोड़ते हुए मेज पर पढ़ा हुआ... [पूरी पोस्ट]
writer अनिल कान्त :

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[20 Feb 2010 06:47 AM]

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