नवगीत: आँखें रहते सूर हो गए --संजीव 'सलिल'
नवगीत;संजीव 'सलिल'*आँखें रहते सूर हो गए,जब हम खुद से दूर हो गए.खुद से खुद की भेंट हुई तो-जग-जीवन के नूर हो गए...*सबलों के आगे झुकते सब.रब के आगे झुकता है नब.वहम अहम् का मिटा सकें तो-मोह न पाते दुनिया के ढब.जब यह सत्य समझ में आया-भ्रम-मरीचिका दूर हो...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
contemporary hindi poetry
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[04 Mar 2010 23:47 PM]



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