नवगीत : चूहा झाँक रहा हंडी में... --संजीव 'सलिल'
नवगीत :चूहा झाँक रहा हंडी में...संजीव 'सलिल'*चूहा झाँक रहा हंडी में,लेकिन पाई सिर्फ हताशा...*मेहनतकश के हाथ हमेशारहते हैं क्यों खाली-खाली?मोती तोंदों के महलों में-क्यों बसंत लाता खुशहाली?ऊँची कुर्सीवाले पातेअपने मुँह में सदा बताशा.चूहा झाँक रहा हंडी...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
acharya sanjiv 'salil'
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[06 Mar 2010 23:13 PM]



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