ये वक्त गुज़र जाएगा

अस्तित्व जब सब कुछ सामान्य और अपनी गति से चलते हुए एकरस हो रहा हो... तब एकाएक कुछ ऐसा हो, जिसकी प्रत्याशा न हो और अनचाहे मेहमान की तरह आ टपके अकेलापन.... तब...? कल शाम से ऐसे ही अकेलेपन से जूझ रहे हैं। रात को सोने तक का सारा वक्त गर्क़ किया टीवी और कम्प्यूटर... [पूरी पोस्ट]
writer डॉ. अमिता नीरव
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[22 Feb 2010 23:11 PM]

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