क्या यही है ज़िंदगी...?
एक सोशल नेटवर्किंग साइट पर किसी ने कामकाजी लोगों के लिए... ज़िंदगी का फ़लसफा लिख भेजा था... पढ़कर लगा कि इसी राह में बढ़ चले हैं हम सब... शायद इसे पढ़कर याद आये... ज़िंदगी की भागमभाग में क्या कुछ छूट रहा है हमसे...शहर की इस दौड़ में दौड़ के...
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Neeraj Shrivastava / Hyderabad, Bhopal, India
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[16 Feb 2010 13:19 PM]



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