पता नहीं कितनी बची हो तुम मेरे भीतर!
तुम्हारी तरह होना चाहता हूं मैं तुम्हारी भाषा में तुमसे बात करना चाहता हूं तुम्हारी तरह स्पर्श करना चाहता हूं तुम्हें तुम होकर पढ़ना चाहता हूं सारी किताबें तुम्हें महसूसना चाहता हूं तुम्हारी तरह वर्षों पहले पढ़ा था कभी मुझमें भी हो तुम ज़रा सा उस ज़रा सा...
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अशोक कुमार पाण्डेय
कविता
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[06 Mar 2010 12:41 PM]



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